vidus

Eternal Learner

जीत का उन्माद

दिग्भ्रमित करता मानव को

बुद्धि कुंद कर देता है

जीत का उन्माद मन को

उत्तेजना से भर देता है।

सब बौने लगने लगते

औ अंधी हो जाती आंखें

अहंकार से परिपू्र्ण हो

उगती कल्पना की पांखें।

मैं ऐसा ,मैं वैसा हूं

मुझ सरीखा कोई नहीं

मेरी नीति से पराजित

हुए सब कोई बचा नहीं।

काल हंसता अलग से

भैया नाच नचाया है

आज तुम पर कल औरों पर

भी खूब आजमाया है।

मेरी चाल समझ न पाए

सरल कुटिल दोनों गति है

त्वरित प्रलय करता हूं

पल में पलटना मति है।

मदिरा से भी भयंकर है

मादकता इस उन्माद का

अहंकार को सर चढाता

याद न रहता औकात का ।

हर शिखर के नीचे खाई

है विस्मृत हो जाता उसे

ऊंची ऊंची उडानें लेता

पर ठेंगा दिखलाता किसे?

उत्तेजना,उन्माद,अभिमान

पतन का कारण बनता है

जय के बाद भी सहजता

सरलता ही मानवता है ।

विद्या

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