संसार रूपी सागर में
तिरते हैं जन
लेकर भूखी आंतें
और प्यासा मन।
आपने देखा है भूख को ?
उसका सम्बन्ध जिजीविषा से है
किन्तु भूख के रूप हैं अनेक
किसी को रोटी की भूख है
तो किसी को दौलत और सम्पन्नता की
किसी को ईर्ष्या की भूख है
तो किसी को मान और सम्मान की
सच तो यह है कि हम सब
अलग अलग तरह की भूख से
परेशान हैं,बदहाल हैं और
अपनी -अपनी भूख को ढोने
पालने और पोसने के लिये विवश हैं ।
लेकिन हममें कभी सच्चाई
समानता ,ईमानदारी की भूख
नहीं जगती ,क्या हो गया
इन मनो भावों का ?हम तो ईर्ष्या
निन्दा बेईमानी की भूख
से परेशान हैं ,इसी को मिटाते हैं
चटकारा ले लेकर और अपने
जीवन को आनंदमय बनाते जाते हैं।
विद्या
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