vidus

Eternal Learner

“ईर्ष्या”

बिना बीज के उगती जाती

फसल भी लहलहाती आती

हवा न पानी न खाद पीती

अनायास ही बढती जाती ।

मन के अंधेरे में जन्म लेती

अकारण बेचैनी बढाती

उन्नति किसी कीदेख न पाती

जल जल कर अपना सर फोडती।

मन का विकार होती है ईर्ष्या

सम्बन्धों की तलवार बनती

इसका रिजल्ट होता विषैला

अनजाने दुश्मनी ही बढाती।

निर्मल मन को गदला करती

परिणाम में दुख ही देती

इसका विष भयंकर होता

स्नेहिल व्यवहार में कांटे बोती ।

मानव मन की अधोगति है

दुर्मति ही इसकी मति है

किसी का खानापीना सोना

कभी नहीं देख सकती है।

विश्व का इतिहास साक्षी है

ईर्ष्या ने सर्वनाश किया है

दूसरों से कहीं ज्यादा

करने वालों का नाश किया है।

फिर भी सहज मनकी बुद्धि है

विनाश करने प्रगट होती है

इससे बचना बच कर रहना

मानव को देती सुमति है।

बिना अग्नि ज्वलन शील है

जलता मन दिखता नहीं है

जला जला कर खाक करता

नष्ट होती सबकी सुबुद्धि है।

जितना बच सके दुर्भाव से

इसके विनाशकारी प्रभाव से

आत्मा निर्मल होता जाये

अगर ईर्ष्या को हम हटायें ।

विद्या

——////——////——////——////——

··················

टिप्पणियाँ

टिप्पणी करे