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“जंगल”

जंगल वृक्षों का समूह नहीं

धरती की धडकन,स्पंदन है

स्वच्छ हवा बहती वेपरवाह

नदियां बहतीं तीव्र प्रवाह।

वनस्पतियां परस्पर मिलकर

प्रेम विवाह करतीं जातीं

नूतन नूतन रूप धर कर

लगातार उगती आतीं ।

कार्य प्रकृति का अनोखा

वश किसी का नहीं चलता

समयानुसार परिस्थिति वश

सारा जंगल बनता बिगडता ।

प्राणवायु का प्रोडक्शन हो

या बादलों का आमंत्रण

सबकुछ अनायास ही करते

हमारे उपयोगी जंगल वन ।

भीषण ताप में शान्त तपता

वर्षा में चुपचाप भींगता

चलतीं जब भी तेज हवाएं

सन सन करके जाने देता।

हवा मुश्किल से निकलती

घने जटिल डालों के बीच

वर्षा भी बूंद बूंद टपकती

घने पत्तों के जालों के बीच।

भूल कर भी नष्ट नहीं करना है

सुन्दरता उगे उगाये जंगल की

पर्यावरण बचा के रखना है

अपनी प्यारी धरती मां की ।

विद्या

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