vidus

Eternal Learner

“चेतावनी”

संभलो बेईमानों

बेईमानी छोडो

प्रगति के रथ को यूं

खंदक में न मोडो।

बिगाडा क्या हमनें

क्या चाहिये तुमको

बता दो आज सबको

कह दो बस तुम हमको।

पता है हमें अतीत

की करूण कहानी से

सुनते रहते हम सब

ये दादी नानी से ।

छोटे स्वार्थी बन कर

पराधीन हो बैठे

धोखा खाते खाते

मन मार रहें कैसे ।

आम्भी जयचंद जैसे

धूर्त दुष्ट जनों ने

बनाया गुलाम हमें

अपने करतूतों से ।

याद करो तुम थोडा

इसके परिणामों को

भोगा है पूर्वजों ने

कितनी विपत्तियों को ।

अगर चाहते वैसी

विपदा न लौटे कभी

छोडो अपना छल छंद

आनंद मनाये सभी ।

विद्या

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