संशय का कीट जब काटे
दूर कौन कर सके उसे
पतन के गर्त में गिर जाते
उबार कौन पाये उसे ।
शंका संशय उत्पन्न करती
मन बुद्धि को भरमाती है
अविश्वास के कारण ये तो
विनाश का मार्ग दिखलाती है।
श्रद्धा जहां विकास करती है
अंतरंग आनन्दित भावों का
संशय तो विनाश ही करता
मन के सारे सद्भावों का ।
कण भर की आशंका जब
गहरे जड जमा लेती
हरे भरे वृक्षों को नष्ट कर
ठूंठ खोखला सा बना देती।
दरार पडती दीवारों में
स्नेहिल भाव सूख जाता
एक दूसरे की जड खोदने में
टूटता जाता परस्पर नाता ।
दाल में कुछ काला लगता
असमंजस में प्राण जाता
दुविधा में मानव फंसता
अपनी बगलें झांकने लगता।
फूंक फूंक कर मट्ठा पीता
दूध से जल जाने के बाद
मन डोलता कान खडे होते
धोखा खा जाने के बाद ।
जागृत कर विवेक बुद्धि को
संशय से बच सकते हम
विश्वास का विस्तार करके
अंतस अमा दूर कर सकते हम ।
विद्या
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