vidus

Eternal Learner

“जख्म”

जख्म इतने गहरे पाये

सिले ही नहीं जा सके कभी

खुले ही घाव लिये जिये

नफरत करते रहे सभी।

वाणी के वाण जब लगते

दिल तो छलनी हो जाता

काल मरहम भी कभी भी

ठीक ही नहीं कर पाता ।

मीठी बातें प्यारा गप शप

भूल भी जाते हैं सभी

विस्मृत नहीं होता वचन दंश

दुखता रहता कभी कभी।

आत्म सम्मान के फटे चीथडे

समेट सिलती रहती मैं

मान अपना बचाने हेतु

क्या कुछ नहीं करती मैं।

दरद घाव का है भीषण

छिपा लेना आसान नहीं

लगा लें जितने भी मुखौटे

स्थिति ही बनती सही नहीं ।

दंश सहते सहते व्यंग के

शान्ति ही मिल पाती नहीं

हृदय धडकता मन व्याकुल

छटपटाती रहती यहीं।

टीसता ब्रण कलेजा का

बिना पीब औ बिना खून

जर्जर होते सारे रिश्ते

याद रहते आटा नून ।

जख्म भरे दिल को मानस

भूल जाना चाहता है

मन से परे हटा करके

वय भर जीना चाहता है ।

विद्या

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