vidus

Eternal Learner

“ज्ञान ”

ज्ञान जग का अनमोल धन है

पाना इसको बहुत कठिन है

असली गुरू कहां मिल पाये

मूल ज्ञान से भेंट कराये।

देना ज्ञान जितना सरल है

ले पाना उतना विरल है

लेना कोई नहीं चाहता है

देना ही सबको भाता है ।

विचित्रता तो यही है इसमें

जितना बांटों बढता जाये

इसका पारावार नहीं है

कहीं भी इसका अंत नहीं है।

सबसे बडा तो यही धन है

बांटते जाओ जितना मन है

दिन दूना औ रात चौगुना

सीमा इसकी तो अनंत है।

जीवन समर में ज्ञान अमर है

परिश्रम से ले पाता नर है

जो जितना लगन से चाहे

वो उतनी मात्रा में पाले।

इसी लगन से एकलव्य ने

धनुर्वाण सीखा था मूर्ति से

राम कृष्ण भी गुरू कुल गये

करने को प्राप्त मानव जैसे।

शिष्य के मन के अंधकार को

यही दूर कर सकता है

चारो वेद अटठारह पुराण को

कंठस्थ करवा सकता है।

शंका समाधान ये करता

जीवन का सत्य बतलाता

सदभावों को जागृत करके

दुर्भावों को दूर करता।

चंचल मन को स्थिर करता

जीवन का रहस्य समझाता

तथागत को भगवान बनाता

नई नई दृष्टि दिखलाता ।

इस अथाह ज्ञान सागर में

जो जितना ही डूब पाता

उतने का भागी बनकर

भवसागर पार कर जाता।

ज्ञान अधूरा विनाशकारी है

सब पर पड जाता भारी है

अहंकार अलग बढाता

अवनति का ही मार्ग दिखाता ।

विद्या

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टिप्पणियाँ

One response to ““ज्ञान ””

  1.  अवतार
    अनाम

    बहुत सुंदर रचना।

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