कबीर का प्रेम ज्ञान मय था
पूर्ण समर्पण मांगता था
बिना किसी विवाद के
नयन मूंद समर्थन देता था।
आज प्रेम की शल्य चिकित्सा
चल रही है समाज में
भावों से अलग हट कर
लेन देन के अंदाज में ।
माता पिता भाई बहन
के रिश्ते भी द्रव्य मय बने
सोना चांदी हीरे मोती
प्रेम की कसौटी बने।
अंधाधुन स्वार्थ घुस गया
इन रक्त सम्बन्धों में
स्वतःप्रेम कहीं मर गया
खो गया अनुबंधों में ।
हर जगह लाभ और जय
चाहिये आज हमलोगों को
प्रेम के सिवा कुछ भी
मिल जाये तो सही हो।
हीर रांझा शींरी फरहाद
बीते दिनों की कथा हुई
प्रेमी का दर्द प्रेमी न समझे
यही प्रेम की दशा हुई।
मार काट मची हुई है
प्रेमी प्रेमिकाओं में
वीभत्स रूप ले लिया है
इनकी कथाओं में ।
सारे आदर्श दूर हुए
आधुनिकता हावी हुई
नंगे वदन स्वच्छन्द आचरण
ये प्रेमिल कथा हुई।
अर्थ प्रेम इतना फैला
सारे प्रेम को लील गया
वात्सल्य श्रृंगार भावों को भी
स्वर्ण रजत से तोल गया ।
विद्या
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