दिग्भ्रमित करता मन प्राण चिंतन
भूल जाता प्रेम सम्बन्ध बंधन
पतित निर्धन नीच दीखते जन
मैं का नशा चढा देता अहं ।
भूल ही जाता गुजरे हुए दिन
प्राप्त दान परोपकार के क्षण
बीती बातें बनती धूल सम
पट्टी बांध देता अक्ष पर अहं।
आकांक्षा उडती जाती गगन
दिग दिगन्त में भ्रमण करता मन
खुद को महान अन्य को तुच्छ कण
मानने की दुर्बुद्धि देता अहं।
शान अभिमान औ रहन सहन
बढते जाते निरन्तर प्रतिदिन
बढती चाह पर के प्रति जलन
पतन की राह ले जाता अहं।
प्रेम ,दया ,करूणा,विश्वास अंत
विनम्रता ,सदाचार का शमन
दर्प घृणा बढे बनावटी पन
अंधा बना के रख देता अहं।
दीखता कहीं नहीं अपना पन
अंदर चलता रहता अनबन
रहता बेतरतीव मस्त मगन
दिखावे की जिन्दगी ही पसन्द।
डूबे जितना अहंकार में मन
टूटता जाता प्रेमिल बंधन
अपनों में आता पराया पन
शुरू होता आपस में जलन।
विनम्रता बडा है मानव धन
झुकने से ऊपर उठता जन
अहंकार करवा देता पतन
पवित्र ग्रंथों का है महत कथन ।
विद्या
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