vidus

Eternal Learner

“नई पीढी की सोच”

ओल्ड स्कूल पेरेन्टस सब

लकीर पीटते ही रहे

कुछ भी करें भाता नहीं

अब हमलोग भी क्या करें।

खाना पाना कपडा सब

पहन लेंगे उनके मन से

पर हर बात उनकी आंख

मूंद मान भी लें कैसे ।

उनको भाता दाल भात

हम वेस्टर्न के दीवाने

आधुनिक युग में पारम्परिक

भोजन कैसे पहचाने।

पास्ता,लजान्या पेन्ने

मार्मरिटा ,नूडल्य ,सूप

उसके पीछे पागल हैं

कैसे खायें दही दूध।

शादी कहां हो किससे हो

बच्चे कब करें कितने करें

सबमें टांग अडाना है

और कितना धीरज धरें ।

प्यारी प्यारी आजादी

छोडें ओबिडियेंट बनें

इस कलयुग में आकर भी

कैसे श्रवण कुमार बने।

इनके ये पुराने नियम

समझ में नहीं आते हैं

बदलते युग की नई सोच

जानना नहीं चाहते हैं।

पीढियों का मतभेद सदा

आता रहा युग युग से

पुराना अच्छा नया बुरा

मन में रहता है इन सबके ।

विद्या

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