vidus

Eternal Learner

“संसार का रूप”

कोई किसी का नहीं जग में

दृष्टिहीन सब अनजान मग में

ब्याकुल नदी सा बहते रहते

अहंकार भर भर कर रग में ।

माता पिता परिवार परिजन

स्वार्थी लगते सारे जन

बातों मे दीखता नकली पन

इस चिन्तन में रहे मन उन्मन ।

प्रेम की परिधि छोटी हुई

यूं सब दूर होते गये

एक वृत से अनेक बनकर

अपनी धूरी पर नाच रहे।

क्या पाना या खोना है

दुर्दशा पर क्या रोना है

सब छोड यहीं जाना है

जीवन का ये फसाना है ।

बने हम किसी का सहारा

प्रभु से अनुरोध हमारा

जरा सा भी सुकर्म करवाये

जिन्दगी को कर्मशील बनाये।

आत्म तत्व महसूस करके

जीवों पर दया दिखाये

महज एक ही तत्व है सबमें

इस ज्ञान को समझ पाये।

कोई नहीं है सहारा

बहते सब अपनी धारा

ये निरन्तर आना जाना

सृष्टि का ये चक्र चलाना ।

ईश्वर का स्वचालित कर्म है

जड चेतन का एक धर्म है

जन्म और मृत्यु के बीच में

जीवित रहना एक भ्रम है

विद्या

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