अपने टिन वाले छप्पर
के नीचे पन्नी टांग कर
सरबतिया बैठी है
सारे बर्तन मांज कर
इसी छप्पर के नीचे
उसने सतरंगी सपने बुने हैं
इसी के नीचे उसने
सात सात बच्चे जने हैं
बचे हैं सिर्फ चार
वे भी दीन हीन लाचार
सरबतिया अपने छप्पर को
छत में बदलने के सपने
देखती है और जीवन के
दिन खेती है।
विद्या
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