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Eternal Learner

“जुगाड”

जुगाड की जुगाड में

लगे हुए हैं हम

जुगाड की सीमा नहीं है

जितना करें वो कम।

दुनिया चलती है जुगाड से

हर जगह बैक डोर खुले

काम निकलवाने के लिये

कितने ही घुसखोर मिले ।

किसी संस्था में नामांकन हो या

कहीं नौकरी पाना ,प्रमोशन का काम हो

या दूसरे की सम्पति हडपना

जुगाड हर जगह प्रेजेन्ट है ।

दूर दूर के रिश्ते दारों को ढूंढ

काम निकलवाना जानते हैं

झूठ मूठ धोखाघडी रिश्वत से

असंभव संभव कर लेते हैं ।

सहकर्मी आगे निकल रहा

उसकी फाइल दबबा दो

तुम्हारा कागज फंसा है

चाय नाश्ता करवा दो।

टेबुल टेबुल फाइल चलता

रूपया इंधन रूप में जलता

उसके वगैर धूल फांकता

अलमारी टेबुल पर रहता।

और तो और मंदिरों में भी

जुगाड शैली अपनाते हैं

हजारों लाखों की भीड में

त्वरित दर्शन कर लेते हैं ।

सीधी सादी राह से ज्यादा

जुगाड में बुद्धि चलती है

कलयुग में ये कला तो

अहर्निश निखरती जाती है।

नेता पद पाने के लिये

नित दल बदलते रहते हैं

पलटू सलटू कुछ भी कहिये

शर्म नहीं करते हैं ।

सरकार बनाने की होड में

दल को फोडा जाता है

इधर दल बचाने की जुगाड में

नेताओं को जोडा जाता है।

विद्या

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