अपने तो अपने होते
अपना पन स्वतः होता
परायों से अपना पन
विरले ही मिल पाता ।
अपनापन की सीमा तो
बसुधैव कुटुम्बकम तक जाती
अगर छोड देते हैं तब
अकेले ही पड जाते।
क्रोध,घृणा ,ईर्ष्या ,घमंड
आपस में दरार बनाते
घोल देते परस्पर जहर
जड में मटठा डालते हैं।
संकट में जो साथ निभाये
धूप छांह में संग रहे
परिजन हों या अन्य जन
वो ही अपना कहलाये ।
मधुर अनुभूति है अपनों की
मन गद गद हो जाता है
प्यार भरी मीठी बातों से
आनंद से भर जाता है।
इनसे अलग पालतू पशु
भी अपने से हो जाते हैं
गाय ,कुत्ता ,बिल्ली ,तोता
पहचान में आ जाते हैं।
एक दूसरे का भाव समझते
आपस में सम्मान करते
अपनापन सद्भाव बढाता
सम्बन्धों को पल्लवित करता।
अपनापन दीखता आंखों से
मीठी मीठी वाणी से
हाव भाव उठना बैठना
सीधे सीधे प्राणी के।
हृदय का भाव उमगता
अपनों का सोंच कर ही
दूसरों को देखते ही
भाव बदल जाते हैं ।
विद्या
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