कुछ कांटे आंखों में चुभते
फिर कुछ हमारे पांवों में
अलग अलग असर डालते
वे हमारे मनो भावों में ।
आंख का कांटा डंक मार
नींद उडा ले जाता है
ईर्ष्या,कटुता,जलन,द्वेष
बढता ही चला जाता है।
रोज खटकता आंखों में
दुश्मन लोगों का व्यवहार
मन निराश होता जाता
मस्तिष्क पर पडता है भार।
आंख के तारे ही कभी
जब कांटे बन जाते हैं
मन वेचैन हो जाता
विचलित हम हो जाते हैं।
पांव का कांटा जब चुभता
असीम पीडा दे जाता
राह चलना कठिन करता
गहरा घाव बना जाता।
अपने पांव का कांटा
अपने से ही निकलता है
पर आंख के कांटे पर
कुछ भी वश नहीं चलता है।
शायद ईर्ष्या कम करके
इसको निकाल सकते हैं
उनकी प्रगति इग्नोर करके
जलन कम कर सकते हैं।
दूसरों के मार्ग में कांटे बोते
पता नहीं क्या सुख पाते
शायद पर पीडा की मस्ती में
जी जी कर आनन्दित होते।
सभी तरह के कांटों से घिर
अपना जीवन चल रहा
अनेक विपरीत भावों से भर
कुहर कुहर कर जी रहा।
विद्या
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