vidus

Eternal Learner

“बुढापा”

खरामा खरामा,आया

बुढापा,इतने दिन बीते

प्रेम ,राग,रस,रंग,करूणा

भरे कितने ही दिन बीते।

स्वच्छ जल की धारा के तट

पर पडे कचरे की तरह

पडे रहने का समय आया

अनुपयोगी वस्तु की तरह।

“सत्तन जीव” का आशीष

अभिशाप अब लगता है

निरर्थक ही जीते जाना

कुछ महत्व नहीं रखता है ।

क्या जरूरत है हमारी

मात्र दवा ,सेवा ,खाना

आते जाते सुबह शाम

हॉय हलो बोलते जाना।

अलग हुई धूरी बच्चों की

अपने वृत पर नाच रहे

जो नृ्त्य कर चुके हम

उसी तर्ज पर नाच रहे।

सूर्य का उगना ,डूबना

वसंत,ग्रीष्म,वर्षा ,शरद

कितने युगों से फेरे इनके

देखे इतने बीते बरस।

जितना ज्ञान पाया हमने

जितना कमाया आजीवन

संग संग ही ले जाना है

मान सम्मान अपनापन ।

अपनी पीढी के लोग अब

मुश्किल से ही मिल पाते हैं

घर के बनाये घेरे में वे

बंध कर ही रह जाते हैं।

बातें भी होतीं फोन पर

परस्पर तबियत हाल चाल

ये नुस्खा वो मरहम योग

क्या अपनायें हों खुशहाल।

बातों की जुगाली करते

काटते काल दोनों जन

गर अकेले रह गये तो

गोविन्द भजते मन ही मन ।

विद्या

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