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Eternal Learner

“धोखा”

धोखा कुटिल चाल है

अनेक दुर्भावों का प्रभाव

बिना हर्रे फिटकरी के

रंग चोखा पाने का भाव।

धोखा खाना बेवकूफी है

या सज्जनों का भोलापन

देने वाले बडी बुद्धि लगाते

दिखाते जाते नंगापन।

क्या करें जो सबकुछ पायें

बिना अधिक परिश्रम के

धक्कम धुक्की करते जायें

मनमानें अपने ढंग से।

सच्ची मेधा अथाह परिश्रम

कुछ भी महत्व नहीं रखता

अगर दाव पेंच दरबारी

आपके लहू में नहीं बसता।

जीवन की मृग मरीचिका

आंखों को भरमाती है

सामने दीखते पर्वत के पार

फूलों की घाटी नजर आती है।

सोने से चमकते कांच

प्रायःछल कर लेते हैं

छलावा भरी स्वर्णिम आभा से

बुद्धि को हर लेते हैं।

प्रेम ,आदर्श ,आचरण ,मान

अपना ध्येय रखने वाले

कभी न धोखा देते किसी को

सन्मार्ग पर चलने वाले।

धोखे से लिया गया था

कुणाल की अति सुन्दर आंखें

तिष्यरक्षिता ने छल करके

तोड डाली थी उसकी पांखें।

जहर खिला कर के अंदर

बाहर जाकर रोते हैं

ऐसे बडे धुरन्धर लोग भी

आपके गांवों में होते हैं।

इतने धोखे खाये हमने

गिनती नहीं हो सकती

कई जन्मों के कर्मों की रेख

मिट भी तो नहीं सकती।

धोखा देने वाले लोग

घर बाहर मिलते रहते

घुरची दाव लगा लगा कर

पछाड पछाड गिराते रहते।

जी जी हां हां जी हां जी

करने वालों की पंक्ति बडी

ऐसा करने वालों की

लगी हुई है लम्बी लडी ।

विद्या

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