vidus

Eternal Learner

“जिजीविषा”

पेड पर से कांव कांव सुन

दादी बोली आंगन से

जरूर आयेगा कोई

अपने घर में बाहर से।

शरीर अशक्त है दृष्टि नहीं

कामनाओं की कमी नहीं

कुछ न कुछ करते रहना ही

हमेशा उनकी आदत रही।

बोलते बच्चे बैठी रहो

क्या करना है काम धाम

खाओ पियो सो जाओ

जपते रहो नित राम राम।

कहती दादी ,”अरे बबुआ “

लगता नहीं है मन ऐसे

आदत रही कुछ करते रहने की

बैठे ठाले रहूं कैसे।

जितना हाथ बंटा सकती

उतना मुझे बंटाने दो

लाओ दे दो आटा गूंथ कर

सेवईयां ही बनाने दो।

पूनी बनाना,रस्सी बांटना

फीता मोडना कितने काम

मन लगा कर करती रहती

कभी न करती आराम ।

कर्मशीलता है उनकी

नस नस में भरी हुई

बैठे बैठे जितना कर पाती

उसको वो छोडती नहीं।

खाना जब देती बहुरिया

हाथ पकड कर बता देती

क्या,कहां,कुछ ,कैसे रखा है

स्पर्श करवा के दिखा देती।

दोहरी कमर बंद आंखें

कृश काया सांवला रंग

बैठती आंगन मे बोरीपर

अपने तामझाम के संग ।

काल के इतने थपेडे सहते

शरीर उनका झुरिया गया

कितने ही दुख सुख झेलते

अंतिम चरण भी आ गया।

जिजीविषा अभी भी उनकी

तनिक भी कम नहीं हुई

जितने भी अंग सक्रिय हैं

शिथिल छोडती ही नहीं।

विद्या

——////——////——-////——-////——-////——-////—-

··················

टिप्पणियाँ

टिप्पणी करे