vidus

Eternal Learner

“पीढी का द्वन्द “

धान की बोरी लदवा कर

भोरे जब दादा फ्री हुए

बैलों की जोडी बथान से

लाकर गाडी में जोड दिये।

भोरूकवा भीनहीं उगा था

तभी धीरू आया था

इतनी देर तक उसी ने

बोरी गाडी पर चढाया था।

बांध जलखय गमछी में

वो पूरे तैयार हो गया था

खडा था गाडी के पास

दादा के इंतजार में था ।

दादा भी तैयार होकर

आंगन से बाहर आने लगे

झोला,छडी,चश्मा,गमछा

छाता लेकर निकल गये।

पीछे पीछे बडी बहू निकली

भरी हुई थी मलिकपन से

चिल्लाई जोर से बोली धीरू

आज नहीं जायेगा धान ये।

दादा को आइडिया नहीं है

औने पौने बेच आयेंगे

इतना बडा घाटा हम क्यों

और कैसे सह पायेंगे।

आदत नहीं थी दादा की

ऐसी बात सुनने की कभी

ये क्या नई आफत आई

धीरू भी सुने किसकी।

मुंह लगाना कठिन है आज

नये युग के लोगों से

बहस करने से बवाल होगा

बदनामी होगी अलग से।

पुकारा धीरू को धीरे से

इधर आ जाओ जरा

तेरी मेहनत बेकार गई

बखेडा हुआ नया नया।

ठंडी सांस छोडते बोला वो

आज समय बदल गया

बैठिये आराम कीजिये

जो हो गया सो हो गया।

हां अब मेरी नहीं चलेगी

इस घर में कोई बात

इसी तरह से लगते रहेंगे

समय समय पर आघात।

अंदर बडी बहू अपनी

हिम्मत पर खुश हो रही थी

लग रहा था उसे उसने

काम किया है बिलकुल सही।

दोनों दो मूड में बैठे थे

एक अंदर एक बाहर

पीढी का द्वन्द दीख रहा था

साफ साफ घर के अंदर ।

विद्या

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