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Eternal Learner

“शिव परिवार में चौपड”

कैलाश की कंदरा में

बिसात बिछी थी चौपड की

गौरी संग भोला बैठे

पासे डालें कौडी की ।

मनोरंजक वातावरण था

गणेश ,कार्तिक भी खुश थे

बसहा,नाग,मयूर ,बाघ

घेर वहां पर बैठे थे।

अरसे बाद माता ने

क्रीडा का समय पाया था

जागृत रहते भंगेरी को

बहलाना तय किया था।

जीतने लगीं जब माता

पूछा दांव पर क्या देंगे

बोले अपना जो कुछ है

वो सारा ही रख देंगे ।

क्रम से चला द्युत का खेल

भोले बाबा हार गये

चांद,सर्प ,त्रिशूल,बाघम्बर

डमरू,कमंडल देते गये।

जीत की प्रसन्नता से मां

उत्सव जैसा मनाने लगी

बाबा नाराज होकर गृह

त्याग कर निकल गये।

धारण कर पत्तों के वस्त्र

निकले वो रिक्त हस्त

इधर प्रसन्न मन माता जी

गृह कार्य में हुईं व्यस्त ।

मनाने बाबा को स्कन्द

मां संग खेले जीत गये

आदर सहित सब कुछ ले के

उनको पहुंचा कर आये।

मातृ भक्त गणेश सक्रिय हुए

बाबा संग खेलने गये

फिर सारा कुछ जीत कर

माता को पहुंचा आये।

शंकर अभी भी बाहर थे

विष्णु ,नारद संग रहे घूम

भक्त रावण भी पहुंचा था

मनाने की मची थी धूम।

रावण ने चूहे को डराया

नारद वीणा देने लगे

विष्णु तो पासा बन बोले

आप इससे खेल लीजिये।

आप कभी न हारेंगे

जीत के मान जायेंगे

दुखी माता भी खुश होंगी

आप घर लौट जायेंगे ।

खेले फिर नये पासे से

बाबा पूरा जीत गये

पासे का राज पता चला

फिर तो भांडा फूट गया ।

क्रोध में आकर गौरा ने

सबको शापित कर दिया

भोले,विष्णु,रावण ,नारद

कार्तिकेय कोई न छूटा।

शंकर ढोयेंगे गंगा को

विष्णु, रावण दुश्मन होंगे

स्कन्द बालक ही रहेंगे

नारद चलायमान रहेंगे।

परम शक्ति शाली मां का

क्रोध बडा भयंकर था

लोक लीला का खिलाडी

अपना ही भोले शंकर था ।

विद्या

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