भाषा का खेल अनोखा है
चाहते क्या क्या कह जाते
अर्थों की झिलमिल आभा
से सबको विस्मित करते।
लेकिन, वेकिन,किन्तु ,परन्तु
अर्थ में लंगडी लगाते
कहना होता कुछ पर
और कुछ ही कह जाते।
भाषा की छडी है ये सब
भाव को उल्टा मोड देते
अन्तर्मन के दुर्भावों को
पल भर में उधेड देते।
चाय अच्छी बनी लेकिन
पत्ती बहुत कम डाला है
सुनने में ही लगता है
कथन में घोटाला है।
अच्छी बनी या नहीं बनी
सीधे साफ नहीं बोलते
लेकिन बोलकर उसमें
कुछ कमी बता जाते।
लडकी तो सुन्दर है
लेकिन थोडी मोटी है
गर ऐसा है तो फिर
सुन्दर ही क्यों कहा?
शब्दों की अर्थ वत्ता को
अर्थ हीनता में बदल डाला
ये शब्द निर्देशित करते
कि दाल में कुछ है काला।
अपने कुछ कर नहीं पाये
उसने बहुत कुछ कर लिया
असफलता छिपाने के लिये
इन शब्दों का प्रयोग किया।
लेकिन वेकिन का प्रयोग
आत्म हीनता प्रदर्शित करते
अंतर्मन की ईर्ष्या को
थोडी शान्ति प्रदान करते।
निराशा भरे हैं ये शब्द
उत्सुकता जगा जाते
लगता है कोई बडा भेद
रह गया आते आते।
सही सही अभिव्यक्ति हेतु
साफ साफ बोलना होगा
अपनी कुंठा को दबा कर
शब्दों का प्रयोग करना होगा ।
विद्या
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