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Eternal Learner

“भाव और भाषा”

भाव आंतरिक अनुभूति है

भाषा अभिव्यक्ति का साधन

भाव बिना भाषा निर्जीव है

निरर्थक ध्वनियों का प्रसाधन।

मानव मस्तिष्क का कमाल है

कुछ ध्वनियों का संयोजन

इससे ही तो निर्मित है

सारी कला ज्ञान विज्ञान ।

सभ्यता की पहली शर्त है ये

अनंत शब्दों से भरी भाषा

व्यक्त करे सभी भावों को

अभिव्यंजना में न हो निराशा।

भावों का खेल है भाषा

नित नूतन अर्थ निकालती

तीनों शब्द शक्तियां मिल कर

वाग्देवी को हैं सम्भालती।

पर इसकी भी कुछ सीमा है

जहां ठिठकना पडता है

“गिरा अयन नयन बिनु बाणी”

तुलसी दास ने भी कहा है।

भाव जब उमडते वाणी

असहाय सी हो जाती है

ढूंढते शब्द नहीं मिलते

आंखें भर भर आती हैं।

असीम सुख, दुख,आभार

व्यक्त करने को भाषा लाचार

रसना तो मौन हो जाती

चक्षु बरसाती जलधार।

रसगुल्ला,जलेबी,पेडा ,रसकदम्ब

चीनी ,गुड,गुलगुला,गुलाबजामुन

ये सब हैं मीठे मीठे

अंतर कैसे समझ पायें हम ।

बोल कर समझा नहीं सकते

बारी बारी से खिलाना होगा

खाओ तुम समझ जाओ अब

तुमको न समझाना होगा ।

परम सत्ता निर्मित मानव गात

विभिन्न रहस्यों से परिपूर्ण पात्र

असंख्य अनुभूतियां रहती हैं

कोमल हृदय में महसूसती हैं।

भाव अपरिमित हैं मस्तिष्क में

भाषा बौनी पड जाती है

सूक्ष्म से सूक्ष्मतर भावों को

शब्द ही नहीं दे पाती है।

विद्या

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