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Eternal Learner

“कसौटियां बदलती हैं”

हर समाज की होती हैं

अपनी अपनी कसौटियां

उसी की परिधि में आतीं

नियम परिनियम चुनौतियां।

अलग अलग जाति में बंटे

हैं कितने तरह के लोग

सब के रहने के ढंग अलग हैं

खान ,पान,मनोरंजन,भोग।

कसौटियां बनी अलग यहां

षोडस कर्म के नियम बने

उसी में बंध कर रहते हैं

सारे परिजन बने ठने ।

माता,पिता,गुरू देवता

हैं पूजन आराधन करो

संस्कारी आज्ञाकारी बन

इस कसौटी पर खरे उतरो।

बदल गई है ये कसौटी

श्रेष्ठ जनों की परवा न करते

उदंडता मन मौजी पन ले

मन माने ढंग से हैं रहते।

जीवन साथी ढूंढना हो

या परिवार नियोजन ही

बंधने को तैयार नहीं हैं

ये बालक बालिका सभी।

बदल गई कसौटी

क्यों शादी ही करें हम

जबकि लिविंग में रह सकते

बंधन रहित बिना किसी गम ।

क्यों पैदा कर बच्चों को

ले उनको पालने का भार

कुछ भी करेंगे हम सब

पर वे नहीं मानेंगे आभार।

खा पी कर मौज करेंगे

जबतक हम जीवित रहेंगे

आगे नाथ न पीछे पगहा

स्वच्छंद हो विचरण करेंगे।

बुढापा किसने देखा है

किसलिये हैं ये वृद्धाश्रम

धन पास रहना चाहिये

नहीं रहेंगे किसी से कम।

चरित्र वरित्र कहां गया अब

शुचिता अशुचिता की बात खत्म

गर्ल फ्रैंड वॉयफ्रैंड कल्चर में

अनमेल जोडे देखते हैं हम।

होड मची कसौटियां तोडने की

माडर्निटी में समाज को मोडने की

पारिवार संस्था बनी वेमानी

कुछ नहीं मानते करते मन मानी ।

विद्या

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