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Eternal Learner

“शिव का वियोग”

दक्ष का यज्ञ ध्वस्त हो गया

माता सती के क्रोध से

किया दाह हवन कुंड में

शिव अपमान के विरोध से ।

वीर भद्र ,महा काली ने

आज्ञा पा विध्वंस किया

जो कुछ भी बचा खुचा था

उसका पूर्ण विनाश किया ।

आक्रोश से विचलित शंभु

उन्मत्त ,उद्भ्रान्त से हो गये

प्राण रहित गात है सती

ये आभास ही खो दिये।

करूण विलाप करते हुए

शिव ब्रह्मांड में चलने लगे

छिन्नमति तीव्र गति से वे तो

सर्व संहार को प्रवृत्त हुए।

महान योगी हैं बाबा

उतने ही बडे भोगी भी

सती के जाने के बाद

वे बन गये थे रोगी भी ।

उनके प्रचंड क्रोध से डर

सृष्टि भी थर्राने लगी थी

अब तो प्रलय ही होगा

दाह देवी कर गई थीं ।

जब भी विसंगतियां आतीं

भोले शंकर के जीवन में

वासुदेव को आना पडता

उनको फिर से संभालने।

उदभ्रान्त बने बाबा को

वो नहीं समझा सकते थे

मृत गात को छोडें आप

विधि भी यही चाहते थे।

प्रलय से जग को बचाने

वो सुदर्शन चलाने लगे

बिना चोट पहुंचाये ही

सती के अंग हटाने लगे।

बावन टुकडे गिरे गात के

उतना ही शक्ति पीठ बना

आस्था का आधार बना

भक्ति पूर्ण संसार बना।

सती के गात हटते ही

शिव शंभु होश में आ गये

थके मन ओज रहित तन ले

अपने कैलाश पर चले गये।

शिव क्रोध से जगत बचाने

चक्रधारी को आना पडा

मतवाले को संभालने

सुदर्शन चक्र उठाना पडा।

विद्या

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