अभिधा,लक्षणा,व्यंजना तीनों
भाषा प्रयोग की शक्तियां हैं
सभी व्यवहार में संग मिलकर
करतीं अनेक अभिव्यक्तियां हैं।
भावों का खेल होती भाषा
नवीन रूप दिखाती रहती
कुशलता से प्रयोग कर कर के
अर्थ की दिशाएं बताती रहती।
राम चला गया ,राम तो गया
मैंने देखा ,मैं देख लूंगा
देखोगे अभी जैसे प्रयोग
अलग अलग बदलते भंगिमा ।
राह देखना ,अनाज देखना
इंतजार करना ,बीनना है
प्रयोग की इतने तरीके हैं
कठिन उनको पहचानना है।
ध्यान ,ब्रह्मांड की अनुभूतियां
सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होती जातीं
परम शान्ति या गहन मौन भाव
अभिव्यंजना से बची रह जाती ।
चिर विरह जब भोगने मिलता
कौन ठीक व्यक्त कर पाता है
अंदर अंदर ही घुलते घुलते
नयनों से झरता रहता है।
ध्वनि के टोन से अर्थ बदलते
जिसे बल या स्ट्रैस कहा जाता
भाषा में इसका करके प्रयोग
व्यंग से भाव व्यक्त किया जाता ।
झटके दे दे अदा दिखलाती
हां में ना ना में हां बनाती
करके अनेक कलाकारियां
भावों संग अठखेलियां करती।
भावों का प्रदर्शन करती भाषा
फिर उसका गोपन भी करती
सभ्यता के तकाजों के अनुरूप
अपनी सज्जा भी है बदलती ।
अंदर में क्रोध उबलता रहता
जी चाहता मुंडी मरोर दूं
पर मीठे शब्द निकलते मुंह से
चाय में चीनी दूं,छोड दूं ।
अब भूख लगी जोरों की
पेट में चूहे भी दौड रहे
खाने को पूछने पर कहते
अभी अभी तो खाकर आये।
ऐसे गोपन प्रदर्शन का गुण
भाषा का ही तो कमाल है
विकसित सभ्यता का तकाजा
वक्ताओं का हाल बेहाल है ॥
विद्या
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