सांध्य गगन में सजा रंगमंच
महा नृत्य का समां बंधा
अर्धनारीश्वर बन कर देव ने
अनुपम रूप धारण किया।
उन दोनों का स्वरूप अनोखा
जटा,लट,तिलक,विन्दी एक संग
कुंडल ,झुमका,बेसर ,सर्प हार
लिपटे रहते उनके सब अंग ।
बाघम्बर औ पीत वस्त्र कटि
को पूर्णतः आवृत किये रहते
सर्प और कनक के कंकण
दोनों हाथों में शोभते।
पायल घुंघरू चरणों में सज
सुमधुर ध्वनि झंकारते
तीव्र ऊर्जा संग मृदु लास्य
की अप्रतिम छवि बिखेरते।
कठोरता कोमलता मिल
एक ही रूप हो गये
ऊर्जा गति तीव्रता शक्ति
कोमल लास्य संग आये।
प्रकृति पुरूष का संतुलन है
चलते ब्रह्मांड का स्वरूप
दोनों परस्पर पूरक हैं
चलती जिससे सृष्टि अनूप ।
तांडव और लास्य दोनों ही
मिलकर करते ऐसा नर्तन
एक दिखाता है संहार
दूसरा प्रदर्शित करता सृजन।
नर्तन की गति से जटाएं
खुलकर बिखर जाती हैं
गंगा की जल धार चतुर्दिक
जलकण उछालनें लगती हैं।
इधर माता का अंग अंग
कोमलता से लचकता है
भाव भंगिमा मुद्राओं से
केवल आनंद मिलता है।
गगन में पहुंचे देवगण
विभोर हो उठे आनंद से
तीव्र ध्वनि करने लगे वो
अपने अपने वाद्य यंत्रों से ।
बेला संध्या की सरक रही थी
निशा की कालिमा की तरफ
परम आनंद में डूबे दर्शक
बढ रहे थे पूर्णता की तरफ।
जगत जननी ,जगत पिता
संग संग सृष्टि चलाते हैं
अनुपम सौंदर्य कीकल्पना कर
नर नारी शीश नवाते हैं
विद्या
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