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Eternal Learner

“कुल्हिया पुचिया”

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छोटी छोटी दो सखियां

खेल रहीं कुल्हिया पुचिया

मिट्टी के वर्तनों में उनकी

सजी हुई पूरी दुनिया।

जाता,चकला,बेलन ले

देगची,कढाई,कलछुन

थाली ,कटोरी ,चम्मच

सारे ही आवश्यक वर्तन।

खेल शुरू होते सजता

घर पर उनका भांडार

बन जाता पकवान बहुत

खिलाती करके मनुहार।

पिनडोवा पत्तों की पूडी

छोटे ढक्कन से काट कर

पानी में छाना जाता है

कुशलता से जांच कर।

घास ,फूस,फूल ,पत्ती के

व्यंजन अनेक बन जाते

फिर दोनों मिलकर उनको

अच्छे से सजाया करते ।

आती गुडियों की बारी

जो रखे रहते बक्से में

लाकर उनको खाना देती

वो मां बन जाती मन में।

जीवन की तैयारी उस

खेल में छिपी रहती है

उसी समय से मां बन

दोनों खेलती रहती।

कभी कभी नोंक झोंक भी

हो जाती दोनों में

पानी मैं लाऊंगी अब

तू खाना दे दे दोनों में।

झगडा इतना बढ जाता

झोंटा झोंटी सब होता

रसोई बिखर जाती है

खेल समाप्त हो जाता।

गुड्डे गुडिया बैठे रहते

मां फिर आ के सम्भालती

गंदा करके छोड गई है

क्यों इतना झगडा करती ?

अगले दिन सब भूल दोनों

फिर आकर मिल जाती

डेंगा पानी ,इक्कट दुक्कट

खेल खेलने लग जाती ।

विद्या

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