रहमत पुर गांव के स्कूल
में पढने जाया करती
वस्ता ,बोरिया,खडिया ले
ईश को नवाया करती ।
कोई ड्रैस नहीं था वहां
जो चाहो वो ही पहनो
लाल ,हरे,नीले,पीले
सब रंग के कपडे पहनो।
पास में ही था स्कूल मेरा
पैदल पैदल जाते थे
कभी कभी स्पेशल अपनी
गाडी से भी थे जाते ।
ताड फल का चक्का बना
मोटी लकडी से जोड कर
उस पर पीढा रख चलती
रस्सियों से खींच कर।
बारी बारी खींची जाती
गाडी कच्ची सडक पर
यूं खींचने कभी बैठने
का मौका मिलता दिन पर ।
सोम मंगली ,मंगल मोहन
बुद्ध भवानी ,बीफे बुधिया
शुक्र, शनि दोनों दिन जाती
सरस्वती के साथ रधिया।
एक ही गाडी पर सारे
हंसी खेल में चढते थे
बाकी बच्चे तमाशा देख
घेर घेर कर चलते थे।
गिनती ,पहाडा,ककहरा
रोज रटवाया जाता था
सबसे पहले लाइन लगा
प्रार्थना करवाया जाता था।
“विनती करते हैं भगवान
हम हैं बालक निपट अजान “
हाथ जोड आंखें बंद कर
मांगते ईश से वरदान।
मीड डे मील नहीं था
न ही टिफिन का झंझट
घंटी बजती दौड कर घर
जा,खा,आते झटपट।
खेल औ ड्रील की घंटी
भी होती थी मस्ती भरी
आइस पाइस खेलते
धप्पा लगाते घडी घडी।
आनंद भरे दिन हमारे
कट गये कैसे पता नहीं
वैसे स्वर्णिम दिन फिर तो
लौट कर आये ही नहीं ।
विद्या
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