अपनी छवि बनाने हेतु
कितने जाल बिछाते हैं
जो हैं वो नहीं दिखा कर
नया औरा बनाते हैं।
दो मुंहा सांप बने हम
बाहर कुछ हैं दायें कुछ
नकली आवरण ओढ
बेवकूफ बनाते रहते हैं।
सुसंस्कृत होते बोल में
रचते रहते नई चाल
ऊपर ऊपर हां हां करते
नीचे जड काट जाते हैं।
मन कितना भी काला हौ
सफेद पोश सज्जन लोग
सब सुखद चाहते हैं।
छवि बनी रहे हमारी
जाने कितना गोपन करते
आवरण सजाते रहते
नकली रूप धरते रहते।
दूसरों की छवि बिगाडने
की भी जुगत भिडाते हैं
ढूंढ ढूंढ कर पोल खोलते
मीडिया में डाल देते हैं।
प्रजातंत्र तो भीड तंत्र है
ज्यादा लोग जो बोलें
सही वही हो जाता है
फिर तो सच माथा फोडे।
जन संचार बना माध्यम
छवि बनाने मिटाने का
तेजी से प्रसिद्धि दिलाने
और बदनाम करने का।
अपनी छवि सुधारने को
सारे चादर झाडते हैं
दूसरों का विनष्ट करने
कीचड भी उछालते हैं ।
विद्या
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