vidus

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“कुबेर के महल में गणपति”

हुआ था धन के देवता

कुबेर को ज्यादा अभिमान

प्रदर्शन करने उसका मन में

उठा था बहुत बडा तूफान ।

सोचा महादेव परिवार को

भोजन हेतु आमंत्रण दे दूं

इसी बहाने अपना ऐश्वर्य

जगत पिता को दिखला दूं।

पहुंचे कैलाश नर वाहन पर

शिव पार्वती के सामने

किया निवेदन अपनी बात

कहा भोजन पर घर आने।

महादेव समझ गये उनके

अंतरमन की वो बात

दिखलाना चाहते हैं कुबेर

अपनी सम्पदा अपनी औकात।

अहंकार दूर करना जरूरी है

सोच कर कहा कुबेर से

बाल गणेश को ले जायें

हम व्यस्त हैं कुछ काम से।

बाल गणेश को लेकर पहुंचे

अपने भव्य भवन में कुबेर

जाते ही लम्बोदर मांगने लगे

भोजन,क्यों हो रही देर।

भोजन तो तैयार ही था

आने लगा उनके सामने

शुरू हो गये गणपति अब

कौन आता हाथ थामने।

धीरे धीरे सारा खा गये

बनाये हुए पकवान

दुबारा तिबारा बनाने के बाद भी

क्षुधा न हुई उनकी शान्त ।

अनाज समाप्त होने पर भी

और और मांगने लगे

नहीं मिलने पर गजवदन

घर का सामान ही खाने लगे।

देख उनकी भयंकर क्षुधा

धन देबता घबडा गये

अतिथि की तृप्ति कैसे करूं

मन ही मन विचारने लगे।

घबराये धन कुबेर दौडे फिर

कैलाश ,शिव शंभु के पास

बतलाई अपनी दशा उन्हें

डरे हुए थे बहुत उदास।

महादेव ने थोडा चावल दिया

कहा इसको खिला दीजिये

इस प्रकार मेरे बालक को

भरपेट भोजन करवा दीजिये।

चावल पका कर खिलाया

कुबेर ने बाल गणेश को

यूं वो शान्त कर पाये

गण नायक की भूख को।

अभिमान ऐश्वर्य का उनका

चूर चूर होगया था

ज्ञान विनम्रता का पाठ उन्हें

अच्छी तरह मिल गया था।

विद्या

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