भादो शुक्ल पक्ष चौथ को
गणेश चतुर्थी प्रारंभ होती
चन्द्रमा को भी अर्घ्य मिलता
दोनों की पूजा होती।
बुद्धि विशारद ,ज्ञान भांडार
विघ्न हर्ता भगवान अन्तर्यामी
अज्ञान ,अंधकार दूर करते
प्रथम पूज्य गणपति स्वामी ।
एक बार दोनों पत्नियों
ऋद्धि सिद्धि के मध्य में
विराज मान थे गजवदन
वहां किसी उपलक्ष्य में ।
रूप गर्वित चन्द्रमा की
नजर जब उन पर पडी
सुन्दरियों बीच सूंढ देख
उसको हंसी आ गई।
उपहास पूर्ण इस हंसी को
गणपति ने देख लिया
उसके अहंकार का दंड
देने को मन में सोच लिया।
रूप का घमंड चूर करने
चांद को श्राप दे दिया
क्षय हो जायेगा तेज सारा
फल भोगो जो घमंड किया ।
आज के दिन अगर कोई
तुम्हें गलती से देख लेगा
झूठा कलंक लगेगा उसे
पाप का भागी होगा।
देखने के लिये तुम्हें
हाथ में फल लेना होगा
बिना लिये देखने पर
भारी कलंक लगेगा।
सुनकर श्राप चन्द्रदेव
बहुत दुखी हुए मन में
प्रकाश क्षीण होने से
अंधकार फैला जग में।
करने लगे निवेदन वे
श्राप दूर करने के लिये
लगे मांगने माफी वे
रूप निखारने के लिये।
बहुत गिडगिडाने के बाद
गणपति ने संशोधन किया
एक जैसा रहने वाला चांद
अब घटने बढने लगा ।
महीने में एक दिन ही
पूरा चांद निकलता है
और एक दिन तो वो
पूरा ही विलीन होता है।
अहंकार विनाशकारी है
गणपति ने बता दिया
घमंडी चांद का घमंड
पल भर में तोड दिया ।
विद्या
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