आयु की इस दहलीज पर
आ खडे हो चुके हैं हम
खरचे दिन ज्यादा हो गये
बचे दिन होते गये कम।
उम्र बढी है या घटी है
गणित इसका बडा कठिन
इसी चिंतन में कटते आज
मुझ जैसे बूढों के दिन ।
जाना जहां ये है निश्चित
टाइम ,मार्ग का पता नहीं
कब,कहां,कैसे निकलेंगे
इसका भी तो पता नहीं।
न्यूज किसी के जाने का
विचलित नहीं करता है
पीछे छूटने की पीडा
ज्यादा दुखी करता है।
कब आयेगा मेरा नंबर
लगता ईश्वर भूल गये
अब तो हाथ पांव भी मेरे
वेजान होकर झूल गये।
कोई जब तबियत पूछता
ध्वनि ये समझ आती है
पूछ रहा कब तक रहना
जीना यहां पर बाकी है।
कब निकलोगे अनंत पथ पर
छोटे, छोटे तो चले गये
तुम यहां पर बैठे ,बैठे
बहुतेरे दिन काट लिये।
क्या कहूं वश में नहीं है
मरना जीना हाथ नहीं
कोई गिरमल हार नहीं
तोड कर चले जायें कहीं ।
जितनी भी मिली हैं सांसें
लेनी तो है ही उतनी
जानेंगे कैसे हम सब
गिनती में हैं कितनी।
जब मन हो ले चलें भगवन
जर्जर इस काया से उबारें
पाप ,पुण्य जो भी किया है
अब भवसागर से तारें ।
विद्या
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