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Eternal Learner

“बैशाख नन्दन “

कितने ही बैसाख नन्दन

करवाते अपना वंदन

रूप गुण एक न होता

लगवाते रहते चंदन।

फूल ,पान ,पत्तों से

अपनी पूजा करवाते रहते

प्रशंसा में अपनी सबसे

सुन्दर सा गीत गवाते रहते।

बना लेते ऐसा औरा

कोई कमी नहीं बताता

सामने प्रशंसा करता

पीठ पीछे हंसी उडाता।

कुंद बुद्धि होने पर भी

अपने को विद्वान समझें

आता है सबकुछ उनको

ज्ञान को आसान समझे।

बैसाख नन्दन खुश होता

मैदान सफाचट देख कर

सब घास मैंने खा लिया

प्रसन्न होता बहादुरी पर।

मूर्खता भरी बातें कर

ढिंढोरा पीटता ज्ञान का

कुछ भी ध्यान नहीं रखता

अन्य लोगों के मान का।

कमी देखते दूसरों की

गलती निकालते रहते

हंसी उडाते ,व्यंग करते

मन ही मन कुरचते रहते।

“अहो रूपम अहो स्वरम”

ऊंट गदहों की बात होती

उनके सामने किसी की

कुछ भी न औकात होती।

ऐसे अज्ञानियों से अपना

परिवेश तो भरा पडा है

सुविद्वानों का समाज

उनके सामने ही खडा है।

विद्या

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