वैदिक काल का शिव मंदिर
ऋषि वशिष्ठ ने बनाया था
गोहाटी की धरती को
तपस्थली सा अपनाया था।
संध्यांचल पर्वत पर बना है
मंदिर औ तपस्थली उनकी
स्वच्छ जल लेकर चलतीं
झरना,धाराएं वहां की।
संध्या,ललिता,कांता तीन
धाराओं के नाम हैं
आगे चल बन जातीं नदी
वाहिनी,वशिष्ठा नाम है।
अनेक औषधीय पौधे
सॉल,सागौन ,आर्किट हैं
मिलते यहां प्रचुरता से
सौंदर्य बढाते रहते हैं।
वंदर ,हाथी,तितलियां हैं
विभिन्न जाति प्रजाति के
अपार भोज्य सामग्री पा
आनंद लेते जीवन के।
छोटे बडे वन पंक्षी रहते
बुलबुल,कोयल,किंग फिशर
मीठे स्वर लहरियां निकालते
कल कल ध्वनि संग सुन्दर ।
धारा का है जल मीठा
शीतल पवित्रता भरा है
सत है जडी बूटियों का
असीम तृप्ति भी देता है।
धारा के दोनों किनारे
फैली हैं समतल चट्टानें
प्रतिदिन पिकनिक मनाते
हैं लोग जाने अनजाने।
शान्ति से बैठ कर यहां पर
ध्यान भी लगा सकते हैं
दिव्य ,भव्य भावनाओं को
अनुभूत कर सकते हैं।
घने जंगल ,ऊंचे पहाड
बनाते हैं मनोरम दृश्य
दोनों तरफ गांव बसे हैं
अति सुन्दर दिखता परिदृश्य।
चट्टानों पर लेट कर
चहुंदिश पहाडियां देखते
ऊपर हरी चोटियों संग
नीला आसमान देखते।
लगातार शोर मचाती ,बहती
अट्टहास ,हा हा करती
नयनाभिराम दृश्य से ये
मानव मन का त्राण हरती।
लगता है मुनि की भव्यता
आज भी वहां उपस्थित है
तपस्या के पवित्र तेज की
आभा वहां पर स्थित है।
विद्या
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