क्यों कूकती कोयल कू कू
मोर पी कहां ,पी कहां करता
वासंती रंग में रंग कर
बाग सबका मन हरता।
धरती ने ओढी पीली चुनरी
सोने से बाल बिखेरे
दान लुटाती हृदय खोल कर
लूट लो प्यारे बच्चों मेरे।
क्यों करते मारामारी तुम
आगे पीछे नहीं सोचते
सारी सृष्टि है हम सबकी
काट छांट क्यों करते रहते।
कल कल छल छल बहती नदिया
झर झर झर झर झरना
सर सर सर सर हवा चलती
बादलों का है पलना।
मन बहता ,बहता चलता है
बुद्धि बैठी सकुचाती है
संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त चेतना
मन को समझाती है।
कितना अनावश्यक है तुम्हारा
इस प्रकार अकुलाना
क्षण क्षण में बंधी सृष्टि में
अपनी बुद्धि लगाना।
पल छिन पल छिन काल सरकता
कोई नहीं रोक पाता
मन में चाहे जो भी सोचो
होना है सो वही होता ।
प्राणवान ऊर्जा को लेकर
मधुर मुस्कान बिखेरें
जग जीवन की चेतनता को
बांटें और बटोरें।
विद्या
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰
टिप्पणी करे