दानवता जीतती रही
मानवता हारती रही
अंधकार फैलता रहा
दम घुटता ही रहा।
पहले जलती थीं बहुएं
दहेज दानव के आतंक से
आज पति भी मर रहा
प्रेमी प्रेमिका प्रपंच से।
मानदंड खुशहाल समाज
के बदलते जा रहे
स्नेह ,सम्मान ,संतोष सभी
अपने मुंह की खा रहे।
विकृतियां बनी यहां पर
मुख्य धारा की जान जहान
दुष्ट लोग पुलकित इधर
ईमानदार हैं परेशान।
तृष्णा अनंत हुई मानव की
आदि अंत का पता ही नहीं
क्या मिले तब सही रहेंगे
इसको ढूंढना होगा कहीं।
काटना,मारना,हडपना
राक्षसों के लक्षण होते
फैल रहा है उनका राज
बाकी लोग रोते रहते।
पूरे विश्व की यही दशा
देखें आप जिधर से भी
युद्ध में झोंके जा रहे
ये छोटे बडे देश सभी।
उटपुटांग नीति अपना कर
अपना उल्लु सीधा करते
छीन कर पराया धन ये
अपनी झोली भरा करते।
क्या पाऊं ,क्या करूं
जग पर अधिकार कर लूं
लाभ की सीमा से दूर जा
शत प्रतिशत लाभ में रहूं ।
विद्या
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