मृतात्मा की शान्ति हेतु
करते वैदिक अनुष्ठान
श्रद्धा ,सम्मान,कृतज्ञता
व्यक्त कर ,करते अनेक दान।
परम्परा की रीत है ये
पितरो को याद करना
तिल,जौ,कुश जल में डाल
उनके प्रति अर्पित करना।
इन्हीं दिनों पितर गण
परिजन के निकट आते
यथा योग्य सत्कार पा
अपने लोक चले जाते ।
नही मिलने पर वे बहुत
निराश हो जाते हैं
दुखी मन से फिर
लौटने को विवश होते हैं।
श्री राम सीता ने पिता को
चित्रकूट,गया में पिंड दिया
उनकी आत्मा की शान्ति हेतु
श्रद्धा से पवित्र कार्य किया।
पितृ पक्ष काल में गया में
जब तर्पण करने गये
शुभ समय में पूजन सामग्री
राम लक्ष्मण ला न सके।
मांग लिया था दशरथ ने
शुभ मुहूर्त आने पर
बालू का ही पिंड दे दो
सीता मेरे हाथ पर ।
फल्गु,वट,केतकी,विप्र,गौ
सबको साक्षी बना कर
सीता ने दे दिया पिंड
महाराज दशरथ को जाकर ।
राम के प्रमाण मांगने पर
वट को छोड सब मुकर गये
अपनी झूठी बात के कारण
सीता के श्राप का भागी बने।
फल्गु अंतःसलिला बनेगी
केतकी से पूजा नहीं होगी
विप्र रहेंगे दरिद्र ,गौ गंदा खायेगी
वट की अमरता सदा रहेगी।
बडा महत्व है पितृ पक्ष का
सनातन धर्म वालों में
जलाशयों,भूमि,सूर्य चांद
की पूजा करने वालों में।
पितर अपने देवता होते
देव गण तो सबके होते
अपने पितरों को प्रसन्न कर
हम उनसे आशीष लेते ।
विद्या
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