हथिया बरस रहा झूम के
सतहा लगा कर रखा है
सात दिनों से किसी ने
सूरज को नहीं देखा है।
सारी चीजें सीली हुई
माचिस ,कपडे ,जलावन
बूढी दादी भी बोलती
भींगा है ये विछावन ।
छप्पर नहीं छराया अबकि
इसका ये नतीजा है
जगह जगह से चू रहा
लगाते बाल्टी औ पतीला है।
भंसा करना और कठिन है
भींगे गोइठा लकडी से
धुंआ ,धुआं हो जाता है
दम घुटता है झकडी से ।
इन्दर देव तबाह न करो
अब तो उखेल कर ही दो
गीले ,सीले चीजों से हमें
आज मुक्त कर ही दो।
कोई बोले करो टोटका
वर्षा को रोकने का
सूरज के निकलने का
और चीजों के सूखने का।
ओझा ओझाइन बनाओ या
सात घर से तेल मंगवा कर
नाती नतनी को लगा कर
रोको झडी दीपक जला कर।
दिन से अनुमान लगाते
कितने दिन रहेगी झडी
महल वालों का एंजॉयमेंट है
हमारी तपस्या की घडी।
कच्चे आंगन के कीचड में
ईंटों से मार्ग बना लेते
उसी पर चढ -चढ कर हम
कुएं से पानी लाते।
एक बार भींग करके
कर लेते बाहर का काम
फिर चुल्हे के पास बैठ
लाल चाय पी करते आराम।
अबकि बडी झडी आई है
धान तो बहुत उम्दा होगा
थोडा रूक -रूक कर बरसे
इससे अच्छा क्या होगा।
भरी बाल्टी का जल फेंक
फिर से है लगाना पडता
किसी न किसी को इस ड्युटि
में लगे ही रहना पडता।
दादी को मोटा चादर दो
ठंड लग रही होगी
खटिया पर ही भोजन देना
किच किच में क्या उठेगी।
ऐसी कशमकश में जाते
हथिया नक्षत्र के ये दिन
आये अगहन चिकना आंगन
कल्पना करता रहता मन ।
विद्या
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