vidus

Eternal Learner

“भाई चारा “

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खेत की मेड को काट कर

पूरा पानी निकाल दिया

कैसे करूंगा खेती अब

ऐसा धोखा दे दिया।

मुंह अंधेरे देखा विष्णु ने

खेत की ओर घूमते हुए

सारा पानी बह गया था

खेत तो सूखा पडा था।

ये सोनुआ का काम है

उसका रोपा तो हो गया

मेरी खेती की करेगा

क्यों इतनी सी भी परवा।

घर आ भाई पर चिल्लाया

लगा जोर से गाली देने

आंख मलते हुए सोनुआ

बाहर आ लगा यूं पूछने ।

क्या हुआ क्यों चिल्लाते हो

सुबह सुबह गाली देते

मैंने कुछ नहीं बिगाडा

ठीक पता नहीं लगाते।

तुम्हारे सिवा किसको मतलब

मेरे बगल में तुम्हारा है खेत

पानी सारा बहा दिया

कैसे बचेगा मेरा खेत।

हो हल्ला सुन गांव के लोग

भी उठ कर आ गये

दोनों भाइयों का तमाशा

मुफ्त में ही देखने लगे।

गालियों का आदान प्रदान

हुआ परस्पर जोरों से

कोई किसी से कम न था

भिड गये दोनों शेरों से।

आम बात थी वहां पर

अक्सर वैसा होता रहता

किसी न किसी बात पर

ऐसा टंटा लगा रहता।

क्रोध शांत होने पर दोनों

दिनचर्या में लग जाते

दोपहर तक खेत के पानी

के लिये जुगाड भिडाते ।

बोलता सोनु डांड से पानी

आ सकता है मेरे भैया

मैंने नहीं निकाला मानिये

मेरी बात मेरे भैया।

चल कर इंतजाम करते हैं

खेती तो होना ही है

लड झगझ कर क्या मिलेगा

परिश्रम तो करना ही है।

संध्या तक करके व्यवस्था

दोनों भाई घर आये

एक ही जगह बैठ कर

दोनों ने भुंजा खाये।

भाई चारा देख देख

सारे लोग अचंभित हुए

सुबह लडाई शाम प्यार

ये लोग सही में भाई हुए।

विद्या

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