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Eternal Learner

“बांध के भक्ति”

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प्रेम समर्पण भक्ति है

निष्काम भाव से भजना

प्रभु के चरणों में सदा

ध्यान लगाये ही रखना।

सकाम भक्ति होती है

मन्नतें कर पूजा करना

नाम ,जप,प्रसाद चढा

बदले में कुछ मांगना।

मर्कट वत होती भक्ति

ईश्वर को पकडे रहना

मार्जार वत होती है

पूर्णतःसमर्पण करना।

बांध के भक्ति नई है

आजकल आई है

करते करवाते लोग

अपने ही भाई हैं।

स्वार्थ वश बांधते हैं

परस्पर करते व्यापार

अधिकारी लोगों को

मिलते रहते उपहार।

चढावा भी चढता है

ऐसी भक्ति में भरपूर

अंतर एक है प्रभु तो

दर्शन देते रहते जरूर।

नाम लिखवाना हो या

नौकरी ही पाना हो

ट्रांसफर करवाना हो

प्रमोशन ही पाना हो ।

सुबह शाम हाजिरी बजा

दरबारी करना होता है

अपने क्षेत्र का प्रसिद्ध

सामान ही देना होता।

इन चीजों से बंधते

आज के प्रभु हमारे

होते प्रसन्न हम पर

सुधार देते काम सारे।

नहीं करते दरबारी जो

आते जाते नहीं हैं

उनकी फाइलें तो

वहीं लाइन में खडी हैं।

विद्या

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