आ गईं माँ जगदम्बा
हो हाथी पर सवार
देने सुख,समृद्धि,धन
दौलत संपदा अपार।
नव रात्रि भक्ति शक्ति और
आत्मशुद्धि का पर्व पावन
भक्त जन करते माँ के
नव रूपों का पूजन।
नौ दिनों में जप ध्यान
पूजन ,अर्चन,आराधन
चक्र से चक्र तक ऊपर
उठ करते चेतना जागरण।
माँ की सेवा में अर्पित
फल,फूल,अनेक भोग
सर्व श्रृंगार की सामग्री
उनकी प्रसन्नता योग।
करते श्रृंगार उनका
काजल,विन्दी,महावर
हंसली,बिछुआ,कंकण
टीका,झुमका,पायल।
लाल रेशमी परिधान
सुनहरे पट्टी वाले
सुन्दर बूटियों से सजे
ह्रदय लुभाने वाले।
सुगन्धित चावल अगहनी
संग नाना प्रकार व्यंजन
षडरस से युक्त स्वादिष्ट
भोग लगाते मन भावन ।
अष्ट भुजा के हाथों में
आठ शस्त्र शोभित हैं
चरणों में गिरा दैत्य
सिंह भयानक क्रोधित है।
कर संहार दैत्य का माँ
भी क्रोधित हो उठतीं
भाव भंगिमा बदल कर ीक
नयन विस्फारित करतीं।
जिस भाव से हैं देखते
वैसी ही दीखने लगतीं
अद्भुत सौंदर्य है माँ का
सबको अचंभित करतीं।
ढोल ,ढाक,मंज़ीर वाद्य
तीव्र स्वर में बजा कर
करते मनोरंजन माँ का
भक्त जन नाच नाच कर।
धूप,दीप,गुग्गुल धुमना
माँ को हैं बहुत भाते
उनकी प्रसन्नता हेतु
नियमित भक्त जन लगाते।
सजता दरबार माँ का
भव्य दिव्यता से परिपूर्ण
भक्तों की भीड़ जमती
हो आशा से परिपूर्ण ।
करते भक्त जन उनको
नाना विध शत शत नमन
करूणामयी कर करूणा
दीजे हमें चरण शरण ।
विद्या
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