सप्तमातृकाओं संग देवी
युद्ध भूमि में आ गईं थीं
धुम्रलोचन बध के बाद
चंड मुंड वहाँ आ गये थे।
करने पराजित उनको
माँ उग्र रूप में आईं
उनके अति क्रोध से
महा काली प्रकट हुईं।
गहरा काला रंग लिये
मुंडों की माला पहने
कटे हाथ का परिधान
दस हाथों में शस्त्र लिये।
चंड मुंड बध के बाद
माता दुर्गा प्रसन्न हुईं
उन्होंने उनको चामुंडा कहा
एक विशिष्ट नाम दे दीं।
युद्ध भूमि में माँ काली
क्रोध भरी विचरतीं थीं
तब आया रक्तबीज
उसकी विशेषता विचित्र थी।
रक्त की जितनी बूँदे
गिरतीं उसकी देह से
उतने रक्तबीज बन जाते
बिना किसी देर के।
देखा माता ने वहाँ पर
रक्तबीज उगते हुए
करने विनाश उसका
भयंकर रूप धारण किये।
लिया एक हाथ में खप्पर
दूजे में लिया कृपाण
क्षिप्रता से लगी काटने
दैत्यों के सर अनगिन।
कटे सर से गिरते रक्त
खप्पर में भर लेती थीं
भर जाने के बाद पूरा
एक साथ पी लेती थीं।
त्रिनेत्र वाली महाकाली
दैत्यों के मांस चबातीं थीं
मुख से रक्त रंजित फेन
लगातार निकालती थीं।
भयानक रूप लिया मां ने
काल को भी खाने वाली
मार काट कर दैत्यों को
युद्ध का रूप बदल डाली।
रक्त अब न गिरता भू पर
खप्पर में या जिह्वा पर
उगना उनका बंद हुआ
माता जीतीं दैत्यों पर।
चामुंडा विकराल काली
मुंडमाला खप्पर वाली
क्रोध का भयावह रूप
दैत्य दलन करने वाली।
करके दैत्यों को नष्ट
ग़ुस्सा उनका शांत न हुआ
करने सृष्टि को विनष्ट
और आगे बढ़ता गया।
फिर देखा महादेव ने
अब तो प्रलय ही होगा
शांत करना देवी को
ससमय अनिवार्य होगा।
निरुपाय शिव शंकर
माँ के मार्ग में सो गये
क्रोधित माता के चरण
उनकी छाती पर पड़ गये।
होश में आईं माता
गलती का एहसास हुआ
निकल गई लम्बी जीभ
क्रोध उनका शांत हुआ।
दुष्टों का संहार करने
भक्तों को देने संरक्षण
आतीं महाकाली माता
देतीं भक्तों को आशीर्वचन ।
विद्या
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