दैत्यराज शुंभ ,निशुंभ सशक्त हुए
त्रिलोक पर अधिकार कर लिया
पुनःदेवताओं को स्वर्गलोक से
बलपूर्वक निष्कासित कर दिया।
माता अम्बिका की बात याद कर
देवताओं ने स्तुति प्रारंभ की
माता पार्वती के शरीर से (कौशिकी)
महासरस्वती माता प्रकट हुईं।
अष्टभुजा श्वेतवर्णा देवी
शंख ,चक्र,गदा,हल लेकर
त्रिशूल,घंटी,धनुष ,वाण
आठों भुजाओं में धारण कर।
अनुपम सौंदर्य का बखान सुन
शुंभ का मन ललचाया
देवी को लाने के लिये उसने
ध्रुमलोचन सेनापति को पठाया।
एक ही हुंकार में देवी ने उसको
पूरा ही भस्म कर दिया
क्रोधित सिंह ने भी दहाड कर
सेना का संहार प्रारंभ किया ।
चंड मुड रक्तबीज को तो
महाकाली रूप में समाप्त किया
सप्तमातृकाएं ,शिवदूती संग
रण भूमि में माता डटी रहीं।
तत्पशचात निशुंभ आया स्वयं
शक्ति के अहंकार में डूबा
विशाल सेना संग भयावह रूप में
लेकर विवाह करने का मनसूबा।
बहुत समय तक लगे रहे दोनों
दिव्यास्त्रों को लेकर रण भूमि में
अंत में वो एक बलिष्ठ नर बनकर
उसकाने लगा युद्ध भूमि में।
ललकार सुन महादेवी भी
अत्यंत क्रोध में भर कर
शीघ्र ही उसको मार गिराया
अस्त्रों से हुंकार भर कर ।
इतनी बडी पराजय देख
शुंभ और अधिक सेना ले आया
व्यंग करते हुए उनको वो
अकेले लडने के लिये ललकारा।
महादेवी ने सभी देवियों को
अपने में समाहित कर लिया
मेरी ही शक्तियां हैं ये सब
दैत्यराज शुंभ को बताया।
उन दोनों के बीच रण में फिर
भयानक लडाई प्रारंभ हुई
धरती ,आकाश,दसों दिशाएं
तुमुल कोलाहल से भर गई।
पराजय से चिढा राक्षस
अति क्रोध में उबलते हुए
तीक्ष्ण से तीक्ष्ण शस्त्रों से
महा सरस्वती पर प्रहार किये।
महादेवी भी बराबरी से
उससे टक्कर लेती रहीं
माया युद्ध का जबाब वो
अपनी माया से ही देती रहीं।
अंततः शुंभ भी परास्त हुआ
जयजयकार होने लगी गगन में
प्रसन्न हो गये देवता गण
अधिकार मिला पुनः स्वर्ग में।
ज्ञान ,विवेक,चेतना रूपी
महा सरस्वती महादेवी हैं
अहंकार,अधर्म,का नाश करने
पृथ्वी लोक पर आई हैं ।
शरद ऋतु की चन्द्रमा समान
चमकीली द्युति है उनकी
अज्ञान ,अंधकार का नाश
अति शीघ्र वो कर देतीं।
भक्तों को परम ज्ञान देतीं
एकाग्रता ,वाणी की शुद्धि
तीनों लोक का आधार आश्रय हैं
सबकी ठीक कर देतीं बुद्धि ।
विद्या
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