“अकाल बोधन”
किया था श्री राम ने भी
शरद में महादेवी पूजन
रण में विजय कामना से
नौ दिन का आराधन।
शारदीय नव रात्र का
प्रारंभ रामचन्द्र से हुआ
पूर्व में सिर्फ़ औ सिर्फ
वासंतिक पूजन होता था।
तंत्र शास्त्र का ज्ञाता रावण
परम शिव भक्त ज्ञानी था
देवी की पूजा कर उन्हें
भी प्रसन्न कर लिया था।
लगातार चल रहा था रण
रावण के महाबली आते रहे
वानर सेना संग दोनों भाई
उनसे टक्कर लेते रहे।
राम औ रावण में जब
होने लगी सीधी टक्कर
राम के दिव्यास्त्र भी
हो रहे थे नष्ट रह रह कर ।
दिव्य दृष्टि से देखा राम ने
रावण के रथ पर दुर्गा थीं
अपने संरक्षण में वो
उससे युद्ध करवा रहीं थीं ।
देख कर उस तरफ़ देवी को
राम तनिक विचलित हुए
दुर्गा माता को प्रसन्न करने
पूजा अर्चन में प्रवृत्त हुए।
लेकर संकल्प बैठ गये
पवित्र ,सुन्दर आसन पर
एक सौ आठ नील कमल
अर्पित करना निश्चित कर।
सारी व्यवस्था हुई फिर
वो संकल्पित आसन पर बैठे
जप,तप,ध्यान,पूजन
क्रम से वे करने लगे।
सुन्दर ,सौम्य, शांत राम
मर्यादा पुरुषोत्तम पूर्ण काम
दुष्टों के संहार में ही
पूरा जीवन किया तमाम।
पूरी श्रद्धा के साथ पूजन में
नील कमल चढ़ने लगे
विजय कामना हेतु राम
आराधन देवी का करने लगे।
एक सौ सात फूल चढ़ गये
जब माता रानी के चरणों पर
तब उनकी रूचि जगी
परीक्षा राम की लेने पर।
नयन बंद थे राम के तभी
एक फूल देवी ने उठा लिया
फूल ढूँढते राम का हाथ
पुष्प पात्र पर फिरने लगा ।
नहीं पाकर पुष्प वहाँ
राम अति विह्वल हुए
पूजन में विघ्न देख कर
अत्यंत सोच में बैठ गये।
किंकर्तव्यविमूढ़ राम बैठे थे
कि एक विचार आया मन में
कहती थी माँ राजीव नयन
मुझे मेरे बचपन में।
देकर एक नयन अपना
अर्चन पूरा करता हूँ
महादेवी के चरणों पर
नमन प्रस्तुत करता हूँ ।
भक्त वत्सला हैं देवी
अवश्य देंगी आशीर्वचन
वाण ले कर उद्धत हुए
राम निकालने को नयन।
देख उन्हें दृढ़ संकल्पित
प्रकट हो हाथ थाम लिया
होगी तुम्हारी विजय राम
तुममें मुझे प्रसन्न किया ।
देख देवी को साक्षात
राम उल्लसित हो गये
चरणों में शीश नवा कर
संकल्पित पूजन पूर्ण किये।
विद्या
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