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“माँ विंध्यवासिनी”

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विंध्यपर्वत माला पर

रहतीं विंध्यवासिनी माँ

योगमाया का प्रत्यक्ष रूप

पहाड़ों वाली जागृत माँ।

कंस ने जब पटक दिया

यशोदा की कन्या को

छूटते ही उड़ी नभ में

अचंभित किया था उसको।

किया था आकाशवाणी

कंस का संहार करने वाला

ले चुका जन्म धरा पर

जग का उद्धार करने वाला ।

योगमाया का तीनों रूप

महा लक्ष्मी ,काली,सरस्वती

विंध्याचल,काली खोह,अष्टभुजा

में यहाँ हैं विराजतीं।

भक्त जन यात्रा करके

आशीर्वाद पाते रहते

स्नान कर गंगा में

विंध्यवासिनी के दर्शन करते।

फिर काली खोह और

अष्ट भुजा की यात्रा करते

इसी क्रम में तीनों की यात्रा

ही त्रिकोण पूरा करते ।

प्राकृतिक सौंदर्य की धनी

ऊँची नीची पर्वत श्रृंखलाएँ

दिव्य,सात्विक ,भावपूर्ण

मंजुल प्रकृति की छटाएँ ।

गंगा की निर्मल धारा

तन्वंगी ,शांत,सुखद ,रूप

सुबह शाम भानु रश्मियों से

सुन्दर चित्र बनते अनूप।

चिकनी बालुका राशि के

ऊपर स्वच्छ जल की धारा

बड़े थाल सा गंगा तट

सुखद है दोनों किनारा।

लक्ष्मी ,काली ,सरस्वती

तीनों यहाँ विराजतीं

संपूर्ण वैभव के साथ

आर्तजनों को आशीष देतीं ।

प्रतिदिन तीन रूपों में

होता देवी का श्रृंगार

बाल,युवा,बृद्ध तीनों में

आता है नूतन निखार।

मनोकामनाएँ पूर्ण करतीं

जो इच्छा हो माँग लो

आशीर्वचन पूरा देतीं हैं

सिर्फ़ उनको आप थाम लो।

विद्या

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