मेला लगता दशहरा का
नाथनगर के कर्ण गढ़ पर
दुकानें सज जातीं हैं
चारों तरफ नीचे ऊपर।
खिलौने ,वंदूक ,पिस्तौल
मिट्टी के पुतले परियाँ
रंग विरंगे सजावटी फूल
सतरंगे लाइट की लड़ियाँ।
एक तरफ़ लगती वहाँ पर
चाट,मिठाई की दुकानें
झालमूढी ,पकौडी,बडा
फालुदा बादाम,मखाने।
लकडी ,प्लास्टिक के सामान
चौकी,पीढा,घोडा ,हाथी
विभिन्न जानवर,पक्षी,गुड्डे
बाल्य जीवन के साथी।
मंच बनता बडा मैदान
दर्शक दीर्घा गोल घेरा
राम लखन धनुष वाण ले
दौडते लगाते फेरा।
एक छोर पर ऊंचे मंच पर
सीता बैठी रहती थीं
दूसरे छोर पर लंका का
परिदृश्य बना रहता था।
घर से तैयार होकर वहां
नाना के संग जाते थे
नया फ्राक ,चप्पल पहन
चोटी में रिबन सजाते थे।
चार आने की परवी
मिलती थी सब लोगों से
कुल मिलाकर दो रूपये
होते थे सबके पास में।
सूर्यास्त के पहले तक
राम लीला देखते थे
उसके बाद तारा मासी
कठघोडवा पर चढते थे।
परवी का कोश हमारा
बचा ही रह जाता था
खाना,पीना,घूमना सब
नाना के मत्थे जाता था।
मीठा,नमकीन,चरपरा
जिसको जो अच्छा लगता
मिलता खाने को सबको
जो भी जो कुछ मांगता।
मामा,मौसी,भाई ,बहन
मिलकर सात आठ होते
नाना के संग घुंघरू जैसे
सभी लोग लटके रहते।
घर लौटते लेकर हम
गुब्बारे,पीं पीं बाजा
बजाते हुए लौटते
जैसे कहीं के हों राजा।
भीड ,ट्रैफिक,धक्का मुक्की
का पता ही नहीं चलता
आज जो टेंशन देते हैं तब
असीम आनंद आता था॥
बहुरंगी कपडे पहने लोग
बूढे ,बच्चे और जवान
जीवंतता से भर जाता था
रामलीला का मैदान ।
विद्या
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