Eternal Learner

“कार्तिक स्नान”

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कार्तिक शुरू हो गया है

भोरे -भोर नानी नहायेगी

किसी किसी दिन गंगा जी

हमको भी लेती जायेगी।

बचपन की वे यादें

आज भी गुदगुदाती हैं

इन बातों में मन विचरता

बहुत ही याद आती है।

सूर्योदय के पूर्व स्नान है

चार बजे ही उठ जाना

नित्य क्रिया से निवृत हो

दातून लेकर चल पडना।

आस पास की नानी ,मामी

मौसी ,मौसेरे भाई बहन

सभी संग जाते थे गंगा

उस समय था यही चलन।

कोई गाडी छकडा नहीं

पैदल ही तो जाना था

अंधेरी रात में केवल

चोरबत्ती ले लेना था।

चांदनी रात में तो

उसकी जरूरत न थी

आगे आगे चलकर

चांद मार्ग दिखाता था।

तेजी से आगे पीछे चल

गंगा तट पर पहुंच जाते

कार्तिक की ठंड में वहां

पानी में जाने से डरते।

कहती नानी एकबार

डुबकी अगर लगा लोगी

फिर पानी गरम लगेगा

निकलना नहीं चाहोगी॥

बडी हिम्मत के साथ घुसती

पानी में सखियों के संग

फिर वहीं उधम मचाती

बडे लोग हो जाते तंग।

आगे नहीं जाओ डुबोगी

कहती नानी पुकार के

बात नहीं मानने पर वे

देती धमकी नहीं लाने के।

दीपों का जलाना बहाना

नित्यदिन का क्रम था

धुंधुलके भरे प्रकाश में

दीपावली का भ्रम था।

धीरे धीरे पौ फटती

उजाला छाने लगता

पंक्षियों का झुंड भी

वहां पहुंचने लगता।

कहती नानी देखो ये सब

भी यहां स्नान करते

भोला मन मान लेता

कहती है तो करते होंगे।

किनारे पसरे बालू से

बडे बडे सीप चुनते

घर लाकर छेद करके

छिलनी खूब बना देते।

गंगा गीत गाती नारियां

झूम झूम कर गाती थीं

प्रातः दर्शन देहु गंगा मैया

गा गा कर सुनाती थीं।

आस्था का ज्वार उमगता

गंगा की राह में

पवित्र तन आनन्दित मन ले

पहुंच जाते थे घर में।

पवित्र महीना कार्तिक

गंगा किनारे पवित्र धाम

नानी संग जो स्नान किया है

वही पुण्य आ रहा काम।

विद्या

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