देना हो हिसाब अगर
हमारे जीवन का
क्या कर सकता हूँ ?
वयां मनमाने पन का ।
भूलचूक लेनी देनी
सबकुछ है साफ़ साफ
फिर भी कितनों का मन
कर न सका है माफ।
कितनी चादर झाड़ूँ
हृदय उड़ेल कर रख दूँ
दूसरों के मन मैल को
कैसे साफ़ कर पाऊँ।
बताऊँ कैसे कि जो भी
ग़लत लगता तुमको अभी
अगर तुम होते तभी
कुछ न कर पाते कभी।
हालात जो करवाते
मानव वही करता है
अपनी तरफ़ से कुछ
बदल नहीं सकता है।
ये करते तो वो होता
वो न किया तो ये हुआ
ऐसे निरर्थक तर्क लेकर
देते रहते हो बद् दुआ ।
क्या करूँ हिसाब मैं
अपनी ग़लतियों का
बड़े पुण्य के काम थे
धनी की चलतियों का ।
वेजार भूमिहीन लोगों को
बसने को ज़मीन दे दी
सूनी जगह को हरियाने
की कोशिश ही की थी।
आज मूल्य बढ़ गया तो
तुम्हें लालच लगता है
उस समय का नजारा
बिलकुल नहीं दीखता है।
जो भी कर दिया हमने
उसे मिटा नहीं सकते
व्यर्थ अपना खून जला कर
तुम कुछ पा नहीं सकते।
विद्या
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