आदि मानव जल श्रोत के
समीप की कंदराओं में
बनाते थे अपना आवास
सुविधाओं की खोज में।
संग्रह का साधन नहीं था
खाना पीना सब मुश्किल
दौड़-दौड नदी तक जाते
प्यास से जब होते विकल।
वहाँ से चल करके आज
देखो कहाँ तक पहुँच गये
तरह ,तरह के डिश ,शरबत
बटन दबाते मिलने लगे।
क्षण में विश्व भर में हम सब
विडियो कॉल कर सकते हैं
जूम मिटिंग में सामने से
बैठ बात कर सकते हैं।
फिर भी संतोष नहीं हमें
ग़ायब होना बाक़ी है
मन की गति से चल पाना
रूप बदलना बाक़ी है।
सोचते ही सब ग्रहों पर
घूमने हमलोग जा सकें
इच्छानुसार उड़ पाने की
क्षमता सबलोग पा सकें।
जितना मिल पाया है हमें
उतना कम ही लगता है
भूल गये विकास करने में
कितना परिश्रम लगता है।
पिछली कथा मालूम है
आगे का तो पता नहीं
कल्पनाएँ साकार होंगी
या कि विनष्ट होगी मही।
धरती को स्वर्ग बनाने को
दुर्लभ साधन पाने को
लगे,भिडे मर,खप रहे हम
भगवान ही बन जाने को।
विद्या
॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰॰(
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